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शासकीय महाविद्यालय सिलफिली में हरिशंकर परसाई जयंती पर व्यंग्य और सामाजिक सरोकारों पर हुई सार्थक चर्चा

शासकीय महाविद्यालय सिलफिली में हरिशंकर परसाई जयंती पर व्यंग्य और सामाजिक सरोकारों पर हुई सार्थक चर्चा
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सूरजपुर/23 अगस्त 2026/ शासकीय महाविद्यालय सिलफिली में हरिशंकर परसाई जयंती का आयोजन किया गया। कार्यक्रम श्री बृजलाल साहू प्राचार्य शासकीय कन्या महाविद्यालय सूरजपुर के मुख्य आतिथ्य में हुआ। विशिष्ट अतिथि श्री संदीप सोनी, सहायक प्राध्यापक शासकीय कन्या महाविद्यालय सूरजपुर रहे।
इसके साथ ही कार्यक्रम का आरंभ मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथि तथा महाविद्यालय के वरिष्ठ प्राध्यापकों द्वारा संस्कृति की देवी माँ सरस्वती के छायाचित्र पर दीप और धूप प्रज्वलन से हुआ। सर्वप्रथम महाविद्यालय की छात्राओं अनामिका तथा मीनाक्षी ने हरिशंकर परसाई का संक्षिप्त जीवन तथा साहित्यिक परिचय प्रस्तुत किया।
बी.ए. प्रथम सेमेस्टर के छात्र प्रियांशु ने परसाई के व्यंग्य ‘‘शिकायत मुझे भी है‘‘ का पाठ कर विद्यार्थियों को देश से पलायन कर रहे प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों, डॉक्टरों की विडंबना के साथ तथा शासन-प्रशासन की बेरोजगारों के प्रति उदासीनता के भाव से अवगत कराया।
छात्रा सोनम ने परसाई के व्यंग्य ‘‘चूहा और मैं‘‘ का पाठ कर देश के लोगों को आपने कर्तव्य के प्रति जागरूकता की आशा व्यक्त की। कार्यक्रम के दौरान हरिशंकर परसाई के जीवन पर आधारित एनसीईआरटी द्वारा निर्मित शैक्षिक वीडियो को प्रोजेक्टर द्वारा प्रस्तुत किया गया। मुख्य अतिथि श्री बृजलाल साहू ने विद्यार्थियों को अभिधा, लक्षणा तथा व्यंजना शब्द शक्ति को समझाते हुए व्यंग्य से उसके संबंध को बताया।
उन्होंने कहा कि परसाई की समाज के लिए चिंता हमें यह संदेश देती है कि हमें समाज के प्रति अपने दायित्वों को समझना चाहिए। हमें समाज के दोहरे चरित्र को भी समझने की आवश्यकता है, जहाँ उसकी कथनी और करनी दोनों में फर्क है। हमें अपने स्वत्व से ऊपर उठकर समाज और देश के लिए योगदान देना चाहिए।
जब हम समाज के विषय में सोचना शुरु करेंगे तभी हमें उसमें मौजूद विभिन्न बुराइयों से साक्षात्कार होगा और हम उनके विरुद्ध आवाज उठा सकेंगे।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र, प्रेमचंद, ज्ञान चतुर्वेदी इत्यादि की रचनाएं हमें समाज के प्रति चिंतन के लिए विवश करती हैं। साहित्य की हर विधा कोई न कोई संदेश देती है और हमें अकेला होने नहीं देती इसलिए अच्छा साहित्य अवश्य पढ़ना चाहिए। महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ अजय कुमार तिवारी ने बताया कि परसाई कबीर के एक प्रिय दोहे ‘‘सुखिया सब संसार है खावे और सोवे। दुखिया दास कबीर है जागे और रोवे‘‘ को अक्सर गुनगुनाते थे। वे समाज के सच्चे पहरेदार थे। परसाई का जागरण समाज की भलाई के लिए था।
परसाई ने समाज के सुनहरे पक्ष के पीछे छिपी कुरूपता को अपने व्यंग्य के माध्यम से प्रस्तुत किया। हरिशंकर परसाई का व्यक्तित्व कबीर की तरह था। उन्होंने ‘‘कागद की लेखी‘‘ पर नहीं बल्कि ‘‘आँखन देखी‘‘ पर विश्वास किया। उन्होंने समाज के मध्य तथा निम्न वर्ग के बीच रहकर सामान्य लोगों, मजदूर, किसान, रिक्शा वाले, ठेला चलाने वाले, कुलीगिरी करने वाले से उनके मन की बातें जानकर समाज के वास्तविक रूप को पहचाना। उन्होंने समाज की वास्तविक बुराइयों और देशव्यापी भ्रष्टाचार को अपने व्यंग्यों का आधार बनाया।
परसाई ने भेड़े और भेड़िए व्यंग्य के माध्यम से कथित प्रजातन्त्र की पोल खोली है। परसाई बताते हैं कि किस प्रकार प्रचार तंत्र किसी भी सरकार को बनाने अथवा गिराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है? ‘‘भोलाराम का जीव‘‘ निबंध में सरकारी कार्यालयों के भ्रष्टाचार को प्रस्तुत करते हैं। ‘‘इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर‘‘ व्यंग्य में वे बताते हैं कि भ्रष्ट पुलिस तंत्र जिसे चांद की पुलिस व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए चांद पर भेजा जाता है। वह वहां की व्यवस्था को भी भ्रष्ट कर देता है। भ्रष्टाचार से त्रस्त चांद का प्रशासन अंततः उसे वापस पृथ्वी पर भेज देता है। हरिशंकर परसाई आचरण और जीवन मूल्य को सर्वाधिक प्राथमिकता देते हैं। इस देश में मानव मूल्यों के पतन का कारण व्यक्ति के लालच और शासन की गलत नीतियों को मानते हैं।
इस कार्यक्रम के अंत में महाविद्यालय के सहायक प्राध्यापक श्री आशीष कौशिक ने सभी को धन्यवाद देकर कार्यक्रम के समापन की घोषणा की। कार्यक्रम के दौरान सहायक प्राध्यापक डॉ प्रेमलता एक्का, श्रीमती अंजना, श्री जफीर, श्री संजय कुमार तथा कार्यालयीन कर्मचारी के साथ बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।