देदला के जंगलों में आस्था का अनूठा धाम.. डेढ़ सौ साल पहले सामने आया था यह सिद्ध स्थल.. प्राचीन गुफाएं और कुंड समेटे है इतिहास; सड़क बनाकर पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की मांग…
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार। प्रकृति की सुंदर वादियों और पहाड़ियों के बीच ग्राम देदला के समीप मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती का प्राचीन धार्मिक स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र है। मनावर से करीब 4 किलोमीटर दूर बड़वानी मार्ग पर ग्राम देदला से लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर स्थित इस स्थल पर तीनों देवियां पिंड स्वरूप में विराजित हैं। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, माताजी बैकुल वृक्ष के नीचे स्वयं प्रकट हुई थीं। पावागढ़, वैष्णो देवी और विजासन माता की तर्ज पर श्रद्धालु इस धाम को विशेष आस्था और श्रद्धा से देखते हैं।
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, यह स्थान धार्मिक मान्यताओं के साथ प्राकृतिक सौंदर्य और प्राचीन इतिहास की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यहां तीन गुफाएं, एक पुरानी बावड़ी और कुंड मौजूद हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार, पहले पहाड़ियों से झरना बहता था और कुंड में वर्षभर पानी भरा रहता था। वर्तमान में भी कुंड को इस स्थल की प्रमुख विशेषताओं में गिना जाता है।
*डेढ़ सौ साल पहले सामने आया था स्थल*
ग्रामीणों के अनुसार, करीब डेढ़ सौ वर्ष पहले ग्राम की एक महिला अचानक लापता हो गई थी। लगभग एक सप्ताह बाद लौटने पर उसने पहाड़ियों के बीच स्थित इस स्थान के बारे में जानकारी दी। इसके बाद ग्रामीणों का यहां आना-जाना शुरू हुआ और धीरे-धीरे यह स्थल श्रद्धा का केंद्र बन गया। हालांकि, माताजी के पिंड स्वरूप में प्रकट होने की वास्तविक तिथि और परिस्थितियों के बारे में कोई प्रमाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, प्राचीन समय में यहां घना जंगल था, जहां शेर, चीते और भालू जैसे वन्यजीव विचरण करते थे। उस समय यहां लोगों का आना-जाना बहुत कम था। बुजुर्गों के बीच यह मान्यता भी प्रचलित है कि ब्रह्म मुहूर्त में मंदिर की घंटियां बजने की आवाज सुनाई देती थी। आज भी कभी-कभी सुबह के समय घंटी की आवाज सुनाई देने की बात ग्रामीण बताते हैं।
*वर्ष 1998 में हुआ मंदिर निर्माण*
स्थानीय जानकारी के अनुसार, वर्ष 1998 में तत्कालीन सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी ने यहां मंदिर और तालाब का निर्माण करवाया था। इसके बाद ग्रामीणों ने भी सामूहिक प्रयासों से पानी के कुंड का निर्माण कराया। समय के साथ इस स्थल की धार्मिक पहचान बढ़ती गई और आसपास के गांवों सहित दूर-दराज के क्षेत्रों से श्रद्धालु यहां पहुंचने लगे।
नवरात्रि के दोनों पर्व के अवसर पर यहां विशेष चहल-पहल रहती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु माता के दर्शन करने पहुंचते हैं। इस दौरान हवन, पूजन और भंडारे जैसे धार्मिक आयोजन भी किए जाते हैं। श्रद्धालु अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए यहां नारियल बांधते हैं और मन्नत पूरी होने पर उसे विधि-विधान से विसर्जित करते हैं।
*गुफाएं, बावड़ी और प्राचीन बसाहट के अवशेष*
ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, पहाड़ी मार्ग के निर्माण के दौरान यहां तीन गुफाएं दिखाई दी थीं। ग्रामीणों ने इनके भीतर जाने का प्रयास किया, लेकिन अंधेरा और घुटन होने के कारण वे अधिक अंदर तक नहीं जा सके। समय के साथ गुफाओं के कुछ हिस्से पहाड़ों के नीचे दब गए।
परिसर में एक पुरानी बावड़ी भी मौजूद है, जिसके निचले हिस्से में दूसरी भाषा जैसी लिपि में लिखावट होने की बात कही जाती है। आसपास के खेतों में खुदाई के दौरान मिट्टी के बर्तन, कोयले के अवशेष और कभी-कभी पुराने चांदी के सिक्के मिलने की बातें भी सामने आती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, करीब 700 से 800 वर्ष पहले यहां किसी अन्य गांव की बसाहट थी। इन संरचनाओं और अवशेषों की वास्तविक प्राचीनता की पुष्टि के लिए पुरातात्विक सर्वेक्षण और वैज्ञानिक जांच आवश्यक है।
*सड़क बने तो पर्यटन स्थल के रूप में मिले पहचान*
ग्रामीणों का कहना है कि मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती के इस प्राचीन धाम तक पहुंचने वाला मार्ग कच्चा और ऊबड़-खाबड़ है। इससे श्रद्धालुओं को आवागमन में परेशानी होती है। यदि यहां तक पक्की सड़क बनाई जाए और पेयजल, साफ-सफाई तथा अन्य मूलभूत सुविधाएं विकसित की जाएं, तो श्रद्धालुओं को काफी सुविधा मिल सकती है।
ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि इस स्थल की धार्मिक महत्ता को देखते हुए पहुंच मार्ग का निर्माण कराया जाए। साथ ही, प्राचीन गुफाओं, बावड़ी और अन्य संभावित ऐतिहासिक अवशेषों का सर्वेक्षण कराकर उनके संरक्षण की व्यवस्था की जाए। उचित विकास कार्य होने पर यह स्थान धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में पहचान बना सकता है और मनावर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत को भी नई पहचान मिल सकती है।
