जनसहयोग से शुरू हुई साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण की पहल, ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने की जगी उम्मीद…. देदला में स्थित मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती का प्राचीन धाम धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक महत्व…
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। ग्राम देदला स्थित प्राचीन बावड़ी के संरक्षण, साफ-सफाई और सौंदर्यीकरण को लेकर अब दानदाता आगे आने लगे हैं। स्थानीय मान्यताओं में पांडवकालीन मानी जाने वाली यह बावड़ी लंबे समय से उपेक्षा का शिकार रही है। अब बाहरी जनसहयोग से इसकी साफ-सफाई की पहल शुरू होने से ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने की उम्मीद जगी है।
बड़े-बड़े पत्थरों से निर्मित इस बावड़ी की बनावट और आसपास मौजूद पुराने निर्माण के अवशेष इसके ऐतिहासिक महत्व की ओर संकेत करते हैं। हालांकि, इसकी वास्तविक प्राचीनता और पांडवकाल से संबंध की पुष्टि के लिए पुरातात्विक जांच आवश्यक है। ऐसे में बावड़ी की मूल संरचना को सुरक्षित रखते हुए इसका संरक्षण करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
*बाहरी जनसहयोग से बदलेगी बावड़ी की सूरत*
प्राचीन बावड़ी की दुर्दशा को देखते हुए ग्राम गुलाटी के परविश भूरिया, आकाश मेंहड़ा, कन्हैया डोडवे, दामू निकम व नारायण पाटीदार देदला ने अपनी मेहनत से मंदिरों व परिसर की साफ सफाई कर बावड़ी में वर्षो से जमी गाद व ग्रामीणों द्वारा डाली गई हवन पूजा सामग्री को निकालकर बावड़ी को सुंदर बनाया गया वही जनसहयोग ओर दानदाता इसके संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए आगे आए हैं। जनसहयोग से बावड़ी की साफ-सफाई कराई गई है। इस पहल से उम्मीद बढ़ी है कि आने वाले समय में अन्य लोग भी इस ऐतिहासिक धरोहर को सहेजने के लिए सहयोग करेंगे।
स्थानीय स्तर पर लोगों का मानना है कि प्राचीन बावड़ियां केवल जलस्रोत नहीं, बल्कि क्षेत्र के इतिहास और पुरानी निर्माण कला की महत्वपूर्ण निशानी होती हैं। समय रहते इनका संरक्षण नहीं किया गया तो इनकी मूल पहचान और संरचना को नुकसान पहुंच सकता है।
*सर्वेक्षण कराकर किया जाए संरक्षण*
बावड़ी की ऐतिहासिकता सामने लाने के लिए संबंधित विभाग द्वारा इसका सर्वेक्षण कराया जाना जरूरी है। इसके बाद विशेषज्ञों की देखरेख में साफ-सफाई, मरम्मत और सौंदर्यीकरण की योजना बनाई जा सकती है, ताकि प्राचीन निर्माण को नुकसान पहुंचाए बिना इसे संरक्षित किया जा सके।
दानदाताओं की पहल से शुरू हुआ यह प्रयास जनभागीदारी के माध्यम से ऐतिहासिक धरोहरों को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। अब जरूरत है कि जनसहयोग के साथ शासन-प्रशासन भी आगे आए, जिससे देदला की इस प्राचीन बावड़ी को उचित संरक्षण मिल सके और आने वाली पीढ़ियां इस विरासत को देख सकें।
*पुरानी बसावट के अवशेष दे रहे इतिहास के संकेत*
*खेड़ा गांव के नाम से पहचाना जाता था देदला गांव*
ग्रामीणों के अनुसार, पूर्व में मां कालिका मंदिर से पुरानी बावड़ी के बीच स्थित इस क्षेत्र को खेड़ा गांव के नाम से जाना जाता था। बाद में पक्की सड़क बनने के दौरान गांव की बसावट दूसरी जगह स्थानांतरित हुई। मंदिर और प्राचीन बावड़ी के बीच आज भी पुरानी बसावट के कुछ अवशेष दिखाई देते हैं। इन अवशेषों के व्यवस्थित अध्ययन से यहां के पुराने रहन-सहन और आवासीय इतिहास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।
उल्लेखनीय है कि पहाड़ियों की शांत वादियां, चारों ओर फैली हरियाली और प्राकृतिक वातावरण के बीच ग्राम देदला में स्थित मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती का प्राचीन धाम धार्मिक आस्था के साथ ऐतिहासिक महत्व भी समेटे हुए है। मनावर से करीब 6 किलोमीटर दूर बड़वानी मार्ग पर देदला गांव से लगभग डेढ़ किलोमीटर अंदर स्थित इस स्थल पर तीनों देवियां पिंडी स्वरूप में विराजित हैं। मंदिर के आसपास प्राचीन बावड़ी, गुफाओं, प्राकृतिक कुंड और पुरानी बसावट के अवशेषों की मौजूदगी इस स्थान को विशिष्ट बनाती है।
