दशहरा मैदान में हर साल जलता है रावण, सरकारी दफ्तरों में कब जलेगा अहंकार का पुतला?..…व्यंग्यात्मक टिप्पणी
रिपोर्टर दिलीप कुमरावत MobNo 9179977597
मनावर। जिला धार।। विजयादशमी पर हर साल रावण का पुतला जलता है। आतिशबाजी होती है, जय श्रीराम के जयकारे गूंजते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या रावण का पुतला जलाने भर से अहंकार, मनमानी और लापरवाही जैसी बुराइयों का अंत हो जाता है? यदि ऐसा होता, तो आम जनता को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर नहीं काटने पड़ते।
मनावर से धार तक विभिन्न शासकीय कार्यालयों में जनता अपने काम और समस्याओं के समाधान की उम्मीद लेकर पहुंचती है। अधिकांश अधिकारी-कर्मचारी अपनी जिम्मेदारी निभाते हैं, लेकिन कुछ के व्यवहार और कार्यप्रणाली को लेकर उठने वाली शिकायतें व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं। कहीं काम में देरी, कहीं सुनवाई का इंतजार तो कहीं आवेदन देने के बाद भी कार्रवाई का पता नहीं। ऐसे में सवाल उठता है कि सरकारी कुर्सी जनता की सेवा का माध्यम है या अहंकार दिखाने का सिंहासन?
*कुर्सी सरकारी, लेकिन तेवर लंकापति जैसे!*
रामायण में रावण के दस सिर थे। सरकारी व्यवस्था में भी जनता को कभी-कभी अहंकार, मनमानी, टालमटोल और लापरवाही के अलग-अलग रूप देखने को मिलते हैं। फरियादी एक टेबल से दूसरी टेबल तक भटकता रहता है और उसकी समस्या का समाधान इंतजार में अटका रहता है।
विडंबना देखिए, रावण की सोने की लंका तो एक दिन में जल गई थी, लेकिन सरकारी दफ्तरों में यदि अहंकार की लंका बस जाए, तो उसे जलाने के लिए जनता को वर्षों तक आवेदन और शिकायतों की आहुति देनी पड़ती है!
शिकायतों पर जांच होना और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि आरोप निराधार हैं, तो निष्पक्ष जांच के बाद स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए। यदि आरोप सही हैं, तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। आखिर न्याय का तराजू सभी के लिए समान होना चाहिए।
*दशहरा मैदान में भी दिखी व्यवस्था की अग्निपरीक्षा*
विजयादशमी पर मनावर के दशहरा मैदान में रावण दहन का आयोजन हुआ। आयोजक समिति ने अतिथियों और वीआईपी के लिए कुर्सियों की व्यवस्था की थी, लेकिन दूसरी ओर बच्चों, महिलाओं और वरिष्ठ नागरिकों को रावण दहन तथा आतिशबाजी देखने के लिए लंबे समय तक खड़े रहकर इंतजार करना पड़ा।
वाहनों की पार्किंग की व्यवस्था तो की गई थी, लेकिन यातायात नियंत्रण का अभाव नजर आया। आरोप है कि कुछ लोग रौब दिखाते हुए छोटे-बड़े वाहन कार्यक्रम स्थल तक ले गए, जिससे आम लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। ऐसे में सवाल उठता है कि जब आयोजन में अतिथियों के बैठने की व्यवस्था हो सकती है, तो बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुविधा तथा आम जनता की सुरक्षा के लिए बेहतर इंतजाम क्यों नहीं किए गए?
लंबे इंतजार के बाद चंद मिनट में रावण का पुतला स्वाहा हो गया। लोग घंटों खड़े रहकर जिस पल का इंतजार कर रहे थे, वह कुछ ही मिनटों में समाप्त हो गया। आतिशबाजी की चमक के बीच आयोजन संपन्न हो गया, लेकिन अव्यवस्थाओं से परेशान लोगों के मन में कई सवाल रह गए।
रावण दहन का आयोजन केवल पुतला जलाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह भी जरूरी है कि आयोजन में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान, सुविधा और सुरक्षित वातावरण मिले। अतिथियों के लिए कुर्सियां और आम जनता के हिस्से में खड़े रहकर इंतजार—यह अंतर व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।
*रामराज्य भाषणों में नहीं, व्यवहार में चाहिए*
रामराज्य की चर्चा करना आसान है, लेकिन उसके आदर्शों को व्यवहार में उतारना अधिक जरूरी है। भगवान श्रीराम के आदर्श मर्यादा, न्याय, कर्तव्य और जनकल्याण का संदेश देते हैं। सरकारी पद पर बैठे व्यक्ति से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वह जनता के प्रति संवेदनशील रहे और अपने अधिकारों का उपयोग जिम्मेदारी से करे।
चाहे सरकारी कार्यालय हो या सार्वजनिक आयोजन, व्यवस्था की सफलता का पैमाना केवल मंच पर बैठे अतिथि, चमकती रोशनी और भव्य आयोजन नहीं हैं। असली कसौटी यह है कि आम नागरिक को कितनी सुविधा मिली, उसकी समस्या कितनी गंभीरता से सुनी गई और उसके साथ कितना सम्मानजनक व्यवहार हुआ।
जनता को चमत्कार नहीं, समय पर काम चाहिए। आश्वासन नहीं, समाधान चाहिए। शिकायतों पर केवल पावती नहीं, उचित कार्रवाई चाहिए। और सार्वजनिक आयोजनों में ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें वीआईपी सुविधा के साथ आम लोगों की जरूरतों का भी ध्यान रखा जाए।
*असली विजयादशमी उस दिन होगी…*
रावण का पुतला जलाना बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस प्रतीक का वास्तविक महत्व तभी है, जब समाज और व्यवस्था अपने भीतर मौजूद बुराइयों को दूर करने का संकल्प लें।
प्रशासन को लंबित शिकायतों की समीक्षा कर जवाबदेही तय करनी चाहिए। सार्वजनिक आयोजनों में यातायात नियंत्रण, पार्किंग, भीड़ प्रबंधन और बच्चों, महिलाओं तथा वरिष्ठ नागरिकों की सुविधाओं को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। व्यवस्था ऐसी हो कि आम नागरिक को अपनी परेशानी लेकर अधिकारियों या आयोजकों के सामने बार-बार गुहार न लगानी पड़े।
क्योंकि रावण का पुतला तो हर साल जलता रहेगा, आतिशबाजी भी होती रहेगी और जय श्रीराम के जयकारे भी गूंजते रहेंगे। लेकिन असली विजयादशमी उस दिन होगी, जब सरकारी दफ्तरों से अहंकार और लापरवाही दूर होगी, सार्वजनिक आयोजनों में आम जनता को वीआईपी से कम नहीं समझा जाएगा और हर नागरिक को सम्मान के साथ अपनी बात रखने तथा सुविधा पाने का अवसर मिलेगा।
तभी रावण दहन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि बुराइयों के अंत का सच्चा संदेश बनेगा।
