संवाददाता निलेश कलसकर अखंड भारत न्यूज़ पांढुरना
पांढुर्णा जिले के ग्राम भंडारगोंदी का जलाशय इन दिनों क्षेत्र में चर्चा का मुख्य केंद्र बना हुआ है। इस जलाशय को लेकर सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में जल संकट के कई दावे किए जा रहे थे, लेकिन जमीनी पड़ताल और सरकारी आंकड़ों ने इस पूरे मामले की हकीकत को साफ कर दिया है।
जलाशय की अनूठी भौगोलिक बनावट और लीकेज: पानी खाली होने का प्राकृतिक रहस्य
भंडारगोंदी जलाशय की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विशेष भूगर्भीय और तकनीकी बनावट (विकेट संरचना) है। विशेषज्ञों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, इस जलाशय की मिट्टी और नीचे की चट्टानी संरचना ऐसी है कि बारिश का पानी जमा होने के बाद वह धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से जमीन के भीतर रिस जाता है (Percolation)।
इतना ही नहीं, जलाशय में लीकेज की समस्या भी लंबे समय से बनी हुई है, जिसके कारण भी जलस्तर तेजी से कम होता है। मानसून के बाद जलाशय का जलस्तर कम होना कोई नया संकट नहीं है, बल्कि यह सामान्य और सालाना होने वाली प्राकृतिक प्रक्रिया और तकनीकी लीकेज का मिला-जुला परिणाम है। यह रिसाव आसपास के इलाकों के भूजल (Groundwater) को रिचार्ज करने में भी मदद करता है।
गांव में नहीं है पेयजल संकट, अफवाहें हुई बेअसर
जमीनी हकीकत के मुताबिक, वर्तमान में ग्राम भंडारगोंदी में पीने के पानी (पेयजल) जैसी कोई गंभीर समस्या नहीं है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार पांढुर्णा जिले में इस साल सिर्फ 22 प्रतिशत कम बारिश हुई है, जो सूखे की श्रेणी में बिल्कुल नहीं आती। खुद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने पांढुर्णा प्रवास के दौरान सार्वजनिक रूप से क्षेत्र में संतोषजनक बारिश की बात कही थी। इसके बावजूद कुछ स्थानीय राजनीतिक तत्वों द्वारा जलाशय के प्राकृतिक रूप से खाली होने और लीकेज को 'गंभीर जल संकट' का नाम देकर अफवाह फैलाने की कोशिश की गई, जो अब पूरी तरह बेअसर साबित हो चुकी है।
किसान निलेश कलसकर के 270 संतरे के पेड़ों को बचाने की राह आसान, पानी न देना किसान के सपनों को रौंदने जैसा
इस पूरे घटनाक्रम के बीच, गांव के सजग किसान निलेश कलसकर द्वारा कलेक्टर को लिखा गया पत्र बेहद महत्वपूर्ण है। उन्होंने सरकारी 'नंदनवन योजना' के तहत लगाए गए अपने 270 संतरे के पेड़ों को बचाने के लिए जलाशय से 'जीवन-रक्षक सिंचाई' (Life-saving irrigation) की अनुमति मांगी है।
कहना गलत नहीं होगा कि शासन की यह नंदनवन योजना ही इस किसान के आर्थिक भविष्य की आखिरी उम्मीद है। किसान के पास न ज्यादा जमीन है, न कोई दूसरा बड़ा सहारा – बस यही 270 पेड़ हैं जिन पर उसने 5 साल तक दिन-रात खून-पसीना बहाकर मेहनत की है। यदि समय पर जीवन-रक्षक पानी नहीं दिया गया, तो यह सिर्फ पेड़ नहीं सूखेंगे, बल्कि एक किसान के 5 साल के सपने भी सूख जाएंगे।
ऐसे में शासन की योजना के तहत तैयार बगीचे को पानी न देना सीधी-सीधी नाइंसाफी होगी और एक गरीब किसान के सपनों को पैरों तले रौंदने जैसा कार्य होगा। चूंकि गांव में पेयजल की कोई वास्तविक किल्लत नहीं है, इसलिए प्रशासन से अब सकारात्मक रुख अपनाने की उम्मीद है, ताकि किसान की आजीविका सुरक्षित रहे और शासन की योजना भी सफल हो सके। इस संबंध में किसान द्वारा इसकी एक प्रति अनुविभागीय अधिकारी (SDM) को भी सौंपी गई है।
